सोमवार, 29 दिसंबर 2014

दोस्ती और प्रेम

तीन  कवितायेँ
-----------------  
                                 ( एक )
दोस्ती और प्रेम 
-----------------
बहुत बरसों बाद 
समझ में आया 
दोस्ती एक यथार्थ है 
प्रेम एक भावुकता 

मैंने दोस्तों के लिए 
कुछ नहीं किया 
मैं दोस्तों से प्रेम करता रहा 
दोस्त मुझ पर अहसान करते रहे 

दोस्त तुम्हारे लिए कुछ करे 
दोस्त के लिए भी कुछ  है  करना पड़ता है 
दोस्ती एक तरफ़ा नहीं होती 
प्रेम एक तरफ़ा हो सकता है 

पचास बरस बाद भी 
पूछा जा  सकता है 
तुमने दोस्तों लिए क्या किया 
यदि कुछ किया है तो 
याद भी रखना पड़ता है 
सिर्फ करना ही पर्याप्त  नहीं 
समय  आने पर  गिनाना   भी  पड़ता है 

दोस्ती एक व्यावहारिकता  है 
मैं दोस्ती को भी 
प्रेम समझता रहा  
       -----------------
                                ( दो )
कवि और समाज 
-------------------
कुछ भी नहीं बदलता 
एक कवि के चले जाने से 

कवि जो करता था 
समाज को बदलने की बात 
बदल नहीं  पाया था स्वयं को भी 


कवि जानता  था 
उसकी कविता 
नहीं बदल सकती दुनिया को 

कवि के चले जाने से 
खाली हो जाती है एक कुर्सी 
सूनी हो जाती है एक मेज 
उदास हो जाती है कुछ किताबें 

कवि के चले जाने से 
भर आते है जिनकी आँखों में आंसू 
बिछुड़  जाने का  जिनको होता है दुःख 
वे कवि के  आत्मीयजन होते है 
जिनके लिए वह कवि नहीं होता  

कवि के चले जाने से 
समाचार नहीं बनता 
चुपचाप  चला जाता है कवि 
जैसे कोई गया ही नहीं हो 
    -----------------
{ प्रकाशित  " वागर्थ " अंक २३३ दिसम्बर ' २०१४}

असामयिक

कविता      
----------
असामयिक 
------------
कुछ भी नहीं होता 
असामयिक 

जिसे हम कहते है 
असामयिक 
वह भी समय पर ही होता है 

हम धारणा बना लेते है 
इस समय यह होना चाहिए 
आयु  को समय से
सम्बध्द  कर लेते है हम 

हर व्यक्ति के सम्बन्ध में 
अलग अलग है समय 
किसी के लिए सामयिक 
किसी के लिए असामयिक 

निश्चित है समय 
कुछ भी होने का 
जो भी होता है 
सामयिक    ही  

 कुछ भी नहीं होता 
असामयिक 
हमारा सोच होता है 
असामयिक 
---------------------

कविता 
----------
सुख और दुःख 
--------------
किसी किसी के हिस्से में आता है सुख 
सबके हिस्से में आता है दुःख 

जो होता है परमसुखी 
उसे भी दुःख का 
अहसास होता है कभी 

जो होते है परमदुःखी 
वे कभी सुख को 
महसूस नहीं कर पाते 
कल्पना करते  है 
शायद  होता है 
या वैसा होता है सुख 

सुखी लोग अपना सुख 
नहीं बांटते कभी 
दुखी लोग बांटते रहते है 
अपना दुःख 
बांटने से  भी  कम नहीं होता        

दुःख  व्यापक  और 
 वर्गहीन  है 
दूसरों  के दुःख से 
हम दुखी हो सकते है 
दूसरों केसुख से '
हम सुखी नहीं होते  
---------------------
[ रविवारीय ' जनसत्ता ' दिनांक १२  अक्टूम्बर ' २०१४ में  प्रकाशित  ]

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

आकस्मिक

कविता 
---------
आकस्मिक
--------------
कुछ भी  हो सकता है 
आकस्मिक 

अपेक्षा  रखते  है 
जिसके के  होने  की 
वह  नहीं होता

योजना  बना कर 
जो  करते  है 
वह भी अक्सर  नहीं होता 

कुछ चीजें  होती है 
जो हम मान कर  चलते  है 
समय  पर नहीं होती 
किन्तु-
आकस्मिक  भी नहीं होती 

कुछ घटनाओं का होना 
निश्चित नहीं होता 
वे होती है आकस्मिक 
जैसे प्रेम 

कुछ  चीजों  का होना 
अपेक्षित नहीं होता 
वे होती है आकस्मिक 
जैसे विश्वासघात 
जैसे  हृदयाघात 

निश्चित होता है 
जिसका  होना 
वह भी होती है आकस्मिक 
जैसे मृत्यु 
 ----------------

अच्छे दिन

कविता  
अच्छे   दिन  
मेरे  वो   बुरे  दिन 
जो  गुजरे  दोस्तों  के साथ 
अच्छे दिन लगते है 

किसी भी समय 
कोई भी दोस्त 
आ  टपकता  घर 
अनचाहे ही  मिल जाता राह में 
दिख  जाता  चौराहे  पर   खड़ा  हुआ 

कई  बार  बातों बातों में 
कट  जाता  पूरा दिन 
घर  से  भूखे  पेट  
निकले  हों  या भर पेट 
इतनी  भूख  हमेशा  रहती 
किसी  दोस्त घर बैठे  हों 
दोस्त  के साथ  खा  लिया   करते 

सड़क पर  रहे हों  तो 
किसी प्याऊ  पर
ठंडा  पानी  पी  कर
ठहाके  लगा लिया  करते 
गर किसी  की भी  
जेब  में  होती एक  चवन्नी 
किसी  थड़ी पर  चाय   पीते  हुए 
घंटों  बिता  लिया  करते 

विश्वास  से भरे  भरे  
जेब से  रीते रीते  
प्रतीक्षा  करते  अच्छे  दिनों की 
गुनगुनाते  रात के तीसरे  प्रहर 
शहर  की सुनसान  सड़कों  पर 
रफ़ी  तलत  और  मुकेश  के गीत 

कितने  अच्छे थे वो दिन 
जब नहीं थी  ईर्ष्या 
नहीं था  अहंकार 
न  ही कोई अपेक्षा  थी  किसी से 

कितने  लम्बे  लगते  थे 
उमीद  से भरे  वो दिन 

कितने मुश्किल , लेकिन 
कितने  अच्छे  लगते  है 
आवारगी  के वो दिन 
    ------------------
[  प्रकाशित  " राजस्थान  पत्रिका "  रविवार  दिनांक  २४  अगस्त ' २०१४ ]